Wednesday, March 6, 2013

एक ग़ज़ल

शाम-ए-ग़म  तुझ  से  जो डर जाते हैं

शब   गुज़र   जाए   तो   घर  जाते  हैं




यूँ     नुमाया     हैं     तेरे     कूचे    में


हम    झुकाए    हुए   सर   जाते     हैं



अब   अना   का  भी   हमे  पास नहीं


वो    बुलाते    नहीं    पर    जाते    हैं



व‍क़्ते  रुख़सत  उन्हे  रुख़सत करने


हम  भी  ता-हद्‍दे   नज़र   जाते   हैं



याद करते  नहीं जिस दिन तुझे हम


अपनी   नज़रो   से   उतर   जाते  हैं



वक़्त     से    पूछ     रहा     है    कोई


ज़्ख़्म    क्या   वाक़ई   भर   जाते   हैं



ज़िन्दगी    तेरे    ताअक़्क़ुब    में हम


इतना   चलते   हैं   कि  मर  जाते  हैं



मुझको    तन्क़ीद    भली   लगती  है


आप    तो   हद   से   गुज़र   जाते   हैं


                            - ताहिर फ़राज़
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Tuesday, February 23, 2010

किस क़द्र सादा हैं हम

किस  क़द्र  सादा  हैं  हम,  कैसी  क़ज़ाएं  माँगें

दुश्मनों  से   भी   मुहब्बत   की  अदाएं  माँगें


हाल यह है कि हुआ पल का गुज़रना भी मुहाल

कितने  ख़ुशफहम  हैं,  जीने  की  दुआएं मांगें


इस क़दर क़हत मसीहाओं का पहले तो न था

अब   तो   बीमारों   से   बीमार  दवाएं   मांगें


उनके   अंदाज़   निराले   हैं   ज़माने   भर   से

ख़ुद  सितम  ढाएंगे  और  हम  से वफाएं मांगें


दल्के महनत पे सदा हमको रहा फ़क्र "हफ़ीज़"

हम  न   अग़यार   से   गुलरंग   कबाएं   मांगें

                                           -हफ़ीज़ सिद्दीक़ी
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मुहाल  :  कठिन
ख़ुशफ़हम  :  ख़ुशियों की आशाएं रखने वाला
क़हत  :  आकाल
दल्के  :  गुदड़ी
फ़क्र  :  गर्व
अग़यार  :  गैर
कबाएं  :  चादर, चोगा

Friday, January 29, 2010

एक ग़ज़ल

बूँद  पानी  की  हूँ  थोड़ी  सी  हवा  है  मुझ में

उस बिज़ाआत पे भी क्या ज़रफ़ा इना है मुझ में




ये  जो  एक  हश्‍र  शबो  रोज़  बपा  है  मुझ में


हो न हो  कुछ  और  भी  मेरे  सिवा  है मुझ में




सफ़ाए  दहर  पे  एक  राज़  की  तहरीर  हूँ मैं


हर  कोई पढ़ नहीं सकता जो लिखा है मुझ में




कभी शबनम की लताफत कभी शोले की लपक


लम्हा लम्हा  ये  बदलता  हुआ क्या है  मुझ में




शहर का शहर  हो जब  अरसाए  मेहशर की तरह


कौन  सुनता  है  जो  कोहराम  मचा  है  मुझ में




वक़्त ने कर दिया "साबिर"  मुझे  सहरा बा किनार


एक   ज़माने  में  समंदर  भी   बहा  है  मुझ  में


                                                   : साबिर
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बिज़ाअत  :  योग्यता
ज़रफ़ा  :  हौसला
इना  :  लगाम
हश्‍र  :  हालात
बपा  :  बीतना
सफ़ाए दहर : दुनिया के पन्ने 
तहरीर  :  लिखाई
लताफ़त  :  कोमलता
अरसाए  :  मैदान
महशर  :  कयामत, प्रलय
कोहराम  :  कोलाहल
सेहरा बा किनार  :  रेत का किनारा